સૂરસાધના

ગુજરાતી લેખિનીમાં સ્વૈરવિહાર

અવલોકનહીન – એક અવલોકન!

     આજે સવારની ચાનો પહેલો ઘૂંટ ભરતાં   ‘ચા તૈયાર છે’ યાદ આવી ગયું. કેવા સરસ ત્રણ ફ્લેશબેક સૂઝ્યા હતા? નીચલા મધ્યમવર્ગની વ્યથાઓને હસતે મુખે વ્હોરતી, માને કેવી સરસ અને લાગણીસભર રીતે યાદ કરી હતી? એને ભાવભરી અંજલિ આપી હતી ? અલબત્ત  અમેરિકાની બાદશાહીમાં અમીરી ચા પીતાં!

     અને આજે સાવ કશું જ નહીં! છેલ્લું અવલોકન  ‘સાધનો’  લખ્યાને અગિયાર દિવસ થઈ ગયા. અને ત્યાર બાદ, કોઈ અવલોકન સૂઝતું જ નથી.

વર્તમાનમાં જીવવાની ક્વાયતે
સર્જનાત્મકતાની પથારી ફેરવી નાંખી!

         ‘અનાવલોકન’  લખ્યું ત્યારે આ જ ભાવ હતો.

       એમ બને કે, સામે રહેલી વસ્તુઓ કે ઘટનાઓ જોઈએ અને કશો વીચાર જ ન આવે? કોઈ પ્રતીક્રીયા નહીં. કોઈ ઉપમા કે કોઈ ઉત્પ્રેક્ષા નહીં. કોઈ રુપક નહીં, કોઈ સજીવારોપણ નહીં, કોઈ દ્રષ્ટાન્ત નહીં, કોઈ જાતનો અલંકાર કે કથા નહીં.

    બસ સાવ કશું જ નહીં?

——

     અરે ભાયા! એમ જીવવાની એક જ ક્ષણ મળી જાય તો? એને પાછી જ ન વાળું ને?

     અને લો! એ ઘડી આવી પૂગી! …. આટલા દિ’ થયા અને કશું જ નહીં. અને આજે વળી એનો વિષાદ!

 અરેરે! મર્કટમન,
તારી ગુલામીથી ક્યારે છૂટીશ?
મુક્ત ગગનમાં ઊડવાનું
ક્યારે થશે?

સાવ અવલોકનહીન?
હર્ષવિષાદહીન?

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3 responses to “અવલોકનહીન – એક અવલોકન!

  1. pragnaju ઓક્ટોબર 5, 2011 પર 9:44 એ એમ (am)

    અરેરે! મર્કટમન,
    તારી ગુલામીથી ક્યારે છૂટીશ?
    મુક્ત ગગનમાં ઊડવાનું
    ક્યારે થશે?
    मन मर्कट चंचल । धांवे सैरावैरा खळ ॥
    मोहमदिरा पीऊन । नाचे विषयवृक्षीं जाण ॥
    शस्त्र निःसंगे ताडिजे । दोर अभ्यासें बांधिजे ॥
    ध्यानधारणे लाविजे । आत्म ’रङग’ तैं पाविजे ॥
    स्वामी विवेकानन्द कहते हैं- ” बाह्य जगत् के व्यापारों का पर्यवेक्षण करना अपेक्षाकृत सहज है, क्योंकि उसके लिए हजारों यन्त्र निर्मित हो चुके है, पर अन्तर्जगत के व्यापार को समझने में मदद करनेवाला कोई भी यन्त्र नहीं।..किन्तु फ़िर भी हम यह निश्चयपूर्वक जानते हैं कि किसी विषय का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने के लिए मन का पर्यवेक्षण करना (मनन ) अत्यन्त आवश्यक है। क्योंकि उचित विश्लेषण के बिना कोई भी विज्ञान निरर्थक और निष्फल होकर केवल बेबुनियाद (भित्तिहीन) अनुमान में परिणत हो जाता है।…द्रष्टा-मन ही अपने दृश्य-मन के अन्दर चल रहे व्यापारों का निरिक्षण-परिक्षण य़ा पर्यवेक्षण करने वाला यंत्र है। मनोयोग (या मनः संयोग) की शक्ति का सही-सही नियमन कर जब उसे अन्तर जगत् की ओर परिचालित किया जाता है, तभी वह मन का विश्लेषण कर सकती है, और तब उसके प्रकाश में हम यह सही सही समझ सकते हैं कि अपने मन के भीतर क्या घट रहा है।” (१:३९)
    अपने जीवन को सुंदर ढंग से गठित कर उसे सार्थक बनाने के लिए मन को सदैव अपनी नजरों के सामने रखना है, उसे अपनी नज़रों से ओझल नहीं होने देना है, उसे अपनी नियत्रण में रखना है। इस हेतु सबसे पहले अपने मन को ही देखना होगा कि उसमें कैसे -कैसे विचार उठ रहे है ? उसके प्रवाह की गति पत्नोन्मुखि है या अन्तर्मुखी है ? वह किस दिशा में अधिक गतिशील है ? केंद्राभिसारी (Centripetal) है, या केन्द्रापसारी(Centrifugal) ?
    चरित्रवान मनुष्य बनने के लिए या जीवन के हर क्षेत्र में सफलता अर्जित करने के लिए, बहुत धैर्यपूर्वक मन के प्रवाह को सजग होकर निरन्तर देखते रहना आवश्यक है। किन्तु प्रश्न है की मन को देखा कैसे जाय ? बाह्य स्थूल पदार्थों को तो हम अपनी आंखों के द्वारा देख लेते हैं। किन्तु मन को तो आँखों से देख नहीं सकते। हम यह भी जानते हैं की मन एक सूक्ष्म पदार्थ है, अतः इसे किसी सूक्ष्म माध्यम से ही देखना पड़ेगा।
    किन्तु मन के जैसी सूक्ष्म, दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं। इस लिए मन को केवल मन के द्वारा ही देखा जा सकता है। शुरू -शुरू में इन सब बातों को सुनकर अचम्भित होना स्वाभाविक है।किन्तु अनजाने ही में हमलोग प्रायः यही तो करते रहते हैं।
    जब हम किसी विषय पर कभी बहुत बहुत तल्लीन हो कर विचार करने लगते हैं, तब हमें यह भी याद नहीं रहता कि हम विचार कर रहे है। हम उन विचारों को देखने में ही खो जाते हैं- अकस्मात हमारी तंद्रा भंग होती है और हमे लगता है, अरे यह क्या हुआ ! हमलोग स्वयं अवाक् होकर सोचने लगते हैं- अरे, इतनी देर से इसी विषय पर मैं चिन्तन कर रहा था ? अर्थात मन कि ओर एकाएक हमारी दृष्टि पड़ जाती है ! ! कौन से माध्यम से यह दृष्टि पड़ी ? तथा यह स्मरण हुआ कि अरे, मैं इतनी देर से विचार कर रहा था ?
    मन के माध्यम से ही ! जैसे मानो मन का ही एक अंश इससे बाहर निकल कर, इससे थोड़ा परे हट कर खड़ा हो- और शेष मन के कार्यों का अवलोकन कर रहा हो ।
    स्वामी विवेकानन्द कहते हैं – ” एकमात्र पुरुष (सिख धर्म में उसको अकाल-पुरूष कहते हैं ) (आत्मा) ही चेतन है। मन तो मानो आत्मा के हाथों एक यन्त्र है। उसके द्वारा आत्मा बाहरी विषयों को ग्रहण करती है। मन सतत परिवर्तनशील है, इधर से उधर दौड़ता रहता है, कभी समस्त इन्द्रियों से लगा रहता है, तो कभी केवल एक से, और कभी कभी तो किसी इन्द्रिय के सम्पर्क में नहीं रह जाता न जाने कहाँ खो जाता है ?
    मान लो, मैं मन लगाकर एक घड़ी की टिक टिक सुन रहा हूँ। ऐसी दशा में आँखें खुली रहने पर भी मैं कुछ देख न पाऊँगा।इससे यह स्पष्ट समझ में आ जाता कि-मन जब श्रवण इन्द्रिय से लगा था, तो दर्शन इन्द्रिय (अर्थात मस्तिष्क मेंस्थित उसका स्नायु केन्द्र optic- nerve) से उसका संयोग न था।
    परन्तु पूर्णता प्राप्त मन(प्रशिक्षित मन ) को (बाह्य विषयों में जाने से रोक कर मस्तिष्क में स्थित) सभी स्नायु-केन्द्रों या इन्द्रियों से एक साथ लगाया जा सकता है।यह उसकी (पूर्ण प्रशिक्षत मन की)” अन्तर्दृष्टि “की( अभ्यास द्वरा विकसित)- शक्ति है, जिसके बल से मनुष्य अपने अन्तर के सबसे गहरे प्रदेश तक में नज़र डाल सकता है। इस अन्तर्दृष्टि को विकसित करना ही (मनः संयोग का या) योगी का उद्देश्य है।” (१:४५)
    सम्यक आसन और स्वच्छ परिवेश में बताये गए पद्धति के अनुसार बैठने के बाद, कुछ देर तक मन में उठने वाले विचारों को केवल देखना है।
    उसका भीषण चांचल्य – कितनी तीब्र गति से वह अनेकानेक विषयों में विचरण कर रहा है, एक चलचित्र की भांति मानस पटल पर न जाने क्या-क्या अंकित होता रहता है। कितने शब्द, कितने चित्र, कितनी यादें और न जाने क्या-क्या ?
    कभी-कभी तो हमें स्वयं ही अवाक् हो जाना पड़ता है कि, अरे ! ऐसे-ऐसे विचार भी क्या- मेरे मन में भरे हुए थे ?
    स्वामी विवेकानन्द कहते हैं- ” अतएव मनः संयम का पहला सोपान यह है कि कुछ समय के लिए चुप्पी साधकर बैठे रहो और मन को अपने अनुसार चलने दो। मन सतत चंचल है। वह बन्दर की तरह सदा कूद-फाँद रहा है। यह मन -मर्कट जितनी इच्छा हो, उछल-कूद मचाय, कोई हानि नहीं ; धीर भाव से प्रतीक्षा करोऔर मन की गति देखते जाओ। लोग जो यह कहते हैं कि ज्ञान ही यथार्थ शक्ति है, यह बिल्कुल ठीक है। जब तक मन कि क्रियाओं पर नज़र न रखोगे, उसका संयम न कर सकोगे। मन को इच्छानुसार घूमने दो।
    सम्भव है, बहुत बुरी बुरी भावनाएँ तुम्हारे मन में आयें। तुम्हारे मन में इतनी असत भावनाएँ आ सकतीं हैं कि तुम सोचकर आश्चर्यचकित हो जाओगे। परन्तु देखोगे, मन के ये सब खेल दिन पर दिन कम होते जा रहे हैं, दिनपर दिन मन कुछ कुछ स्थिर होता जा रहा है।
    पहले कुछ महीने देखोगे, तुम्हारे मन में हजारों विचार आयेंगे, क्रमशः वह संख्या घटकर सैंकडो तक रह जायेगी। फ़िर कुछ और महीने बाद वह और भी घट जायगी, और अन्त में मन पूर्ण रूप से वश में आ जायगा। पर हाँ, हमें प्रतिदिन धैर्य के साथ अभ्यास करना होगा।

  2. સુરેશ ઓક્ટોબર 5, 2011 પર 12:40 પી એમ(pm)

    पहले कुछ महीने देखोगे, तुम्हारे मन में हजारों विचार आयेंगे, क्रमशः वह संख्या घटकर सैंकडो तक रह जायेगी। फ़िर कुछ और महीने बाद वह और भी घट जायगी, और अन्त में मन पूर्ण रूप से वश में आ जायगा। पर हाँ, हमें प्रतिदिन धैर्य के साथ अभ्यास करना होगा।
    ———-
    Pragnaben,
    Thank you very much for this great Input from a great man.

  3. chandravadan ઓક્ટોબર 5, 2011 પર 1:26 પી એમ(pm)

    Sureshbhai,
    Nice Post..& very nice Comment by Pragnajuben Vyas.
    Pragnajuben had visited my Blog to read ” VANDARO ane SHIYAL” a short Balvarta.
    I invite to read that Post with this LINK>>>>

    http://chandrapukar.wordpress.com/2011/10/02/%e0%aa%b5%e0%aa%be%e0%aa%82%e0%aa%a6%e0%aa%b0%e0%ab%8b-%e0%aa%85%e0%aa%a8%e0%ab%87-%e0%aa%b6%e0%aa%bf%e0%aa%af%e0%aa%be%e0%aa%b3/

    Hoping to see you on the Blog !
    Chandravadan

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